"अगर पत्नी पति को छोड़कर चली जाये तो क्या पति दूसरी शादी कर सकता हे ?" कानून के अनुसार यदि पत्नी बिना किसी न्यायसंगत कारण के पति को छोड़ देती हे और पत्नी ने कोर्ट से तलाक नहीं लिया है, तो वह दूसरी शादी नहीं कर सकता है । दूसरी शादी करने पर यह विवाह अवैध माना जाएगा और उस पर दूसरी शादी करने का मुकदमा भी चल सकता है । लेकिन यदि पति ने वैध तरीके से दूसरी शादी करता है । तो उस पर दूसरी शादी करने का मुकदमा नहीं चल सकता है। यदि पत्नी ने न्यायोचित कारण के पति को छोड़ दिया है ओर पति ने उसे बुलाने के लिए बहुत प्रयास किए है और फिर भी वो नहीं आई । फिर पति तलाक का मुकदमा कर एवं तलाक होने पर वह दूसरी शादी कर सकता है। जो की कानूनी रूप से वैध होगी । ध्यान देने योग्य बाते। 👉 पत्नी का अलग रहना तलाक नहीं होता । 👉 दूसरी शादी करने के लिए कोर्ट से तलाक का आदेश या डिक्री होना आवश्यक है। 👉 पत्नी दुवारा धोखा देने या छोड़े जाने पर भी, जब तक तलाक नहीं होता , दूसरी शादी करना कानूनी अपराध होगा। पति-पत्नी के बीच जब मतभेद गहरे हो जाते हैं और साथ रहना संभव न रहे, तब भी एक बात हमेशा याद रखनी ...
घरेलू हिंसा में सास ससुर और ननद का नाम क्यो जोड़ा जाता है। घरेलू हिंसा के मामलो में कई बार देखा गया है कि पत्नी शिकायत दर्ज कराते समय सिर्फ पति का नाम नहीं, बल्कि सास ससुर और ननद जैसे अन्य रिशेदारों के नाम भी शामिल कर देती है। ऐसा क्यों होता है? कई मामलों में यह कदम भावनात्मक तनाव, गुस्से या परिवार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से उठाया जाता है। कभी-कभी यह सच भी होता है कि पति के अलावा अन्य परिजन भी मानसिक, आर्थिक या भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करते हैं। लेकिन बहुत से मामलों में रिश्तेदारों का नाम केवल केस को मजबूत दिखाने या पति के परिवार पर सामूहिक दबाव डालने के लिए जोड़ा जाता है। कोर्ट के कई निर्णयों में साफ किया गया है कि यदि किसी रिश्तेदार की घरेलू हिंसा में सीधी भूमिका या स्पष्ट सबूत नहीं है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। झूठे आरोप न केवल निर्दोष व्यक्तियों को परेशान करते हैं, बल्कि असली पीड़ितों के मामलों को भी कमजोर करते हैं। निष्कर्ष- जरूरी है कि घरेलू हिंसा के मामले में केवल उन्हीं लोगों का नाम शामिल किया जाए जिनकी भूमिका के ठोस प्रमाण मौजूद हों, ताकि न्याय का ...
तलाक कोई आसान रास्ता नहीं होता । यह न्यायालय में कई चंरणों से होके गुजरता हे। जानिए केसे । ? परिवार न्यायालय (फॅमिली कोर्ट ) में याचिका दाखिल होती है । : पति या पत्नी परिवार न्यायालय (फॅमिली कोर्ट ) में याचिका दाखिल करते है। यह याचिका या तो आपसी सहमति से या किसी विवादित आधार पर होती है , जैसे : क्रूरता , परित्याग , या विवाह के बाद किसी गैर मर्द से शारीरिक संबंद रखना । नोटिस और जबाब : कोर्ट दूसरा पक्ष बुलाता है । दूसरा पक्ष अपनी लिखित आपत्ति या जबाब दाखिल करता है। साक्ष्य और जिरह : दोनों और से गवाह और दस्तावेजी सबूत पैस होते है । वकील जिरह करते है । यही प्रक्रिया सबसे ज्यादा समय लेती है । मध्यस्थता का प्रयास : फॅमिली कोर्ट कई बार दोनों पक्षो को सुलह के लिए काउंसिलिंग या मध्यस्थता का मौका देती है । यदि समझोता नहीं होता है तो फिर केस आगे चलता है। फॅमिली कोर्ट का निर्णय ( डिक्री औफ़ डिवोर्से ): सारे सबूत और दलीले सुनने के बाद फॅमिली कोर्ट फैसला सुनाता है । तलाक की डिक्री जारी की जाती है।...
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