एससी/एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत तभी जब प्रथम दृष्टया मामला साबित न हो:-सुप्रीम कोर्ट
एससी/एसटी ऐक्ट में अग्रिम जमानत तभी जब प्रथम द्रश्यता मामला साबित न हो: सुप्रीमकोर्ट
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर रोक है। लेकिन यह रोक पूर्ण नहीं है, बल्कि तभी लागू होगी जब प्रथम दृष्टया यह साबित हो जाए कि आरोपी ने अधिनियम की धारा 3 के तहत अपराध किया है।
क्या कहा अदालत ने?
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा
धारा 18 स्पष्ट रूप से सीआरपीसी की धारा 438 (अग्रिम जमानत) की प्रयोज्यता को बाहर करती है।
यदि आरोप विशिष्ट हों और प्रथम दृष्टया अपराध साबित होता हो, तो आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।
लेकिन यदि अदालत को लगे कि आरोप निराधार और योग्यता-रहित हैं, तो धारा 438 के तहत अदालत विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।
पृष्ठभूमि-
यह मामला महाराष्ट्र के धाराशिव ज़िले का है, जहाँ चुनाव के बाद झगड़े के दौरान एक दलित परिवार पर हमला और जातिसूचक गालियाँ देने का आरोप लगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे राजनीतिक प्रेरित मानते हुए अग्रिम ज़मानत दे दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटते हुए कहा कि इस्तेमाल किए गए शब्द जातिवादी थे और सार्वजनिक रूप से कहे गए थे। इसलिए यह मामला अधिनियम के तहत अपराध बनता है।
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