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Supreme Court ने 4 साल पुरानी रेप केस को किया खारिज, अस्पष्ट आरोपों को माना आधारहीन

  सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल पुराने रेप केस को किया खारिज, असपष्ट आरोपों को माना आधारहीन  Supreme Court ने हाल ही में एक रेप मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें अल्जेड आरोपों और चार साल के देरी से केस दर्ज होने को देखते हुए मुकदमा खारिज कर दिया गया। मामले की पृष्ठभूमि- मामला चार साल पहले दर्ज किया गया था, लेकिन जांच और आरोपों में स्पष्टता नहीं थी। आरोपियों ने तर्क दिया कि देर से शिकायत और अस्पष्टता के कारण मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। कोर्ट के तर्क- 1. Delay in filing complaint: कोर्ट ने कहा कि 4 साल की देरी मामले की credibility को प्रभावित करती है। 2. Vague allegations- अस्पष्ट और contradictory बयान साक्ष्य की कमी दर्शाते हैं। 3. Fair trial का अधिकार-आरोपी पक्ष के न्यायपूर्ण सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने मुकदमे को खारिज किया। फैसला- Supreme Court ने मुकदमा खारिज कर दिया। यह फैसला अस्पष्ट और पुरानी शिकायतों पर मुकदमा चलाने में सावधानी बरतने की दिशा को स्पष्ट करता है।

एससी/एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत तभी जब प्रथम दृष्टया मामला साबित न हो:-सुप्रीम कोर्ट

 एससी/एसटी ऐक्ट में अग्रिम जमानत तभी जब प्रथम द्रश्यता मामला साबित न हो: सुप्रीमकोर्ट  सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर रोक है। लेकिन यह रोक पूर्ण नहीं है, बल्कि तभी लागू होगी जब प्रथम दृष्टया यह साबित हो जाए कि आरोपी ने अधिनियम की धारा 3 के तहत अपराध किया है। क्या कहा अदालत ने? मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा धारा 18 स्पष्ट रूप से सीआरपीसी की धारा 438 (अग्रिम जमानत) की प्रयोज्यता को बाहर करती है। यदि आरोप विशिष्ट हों और प्रथम दृष्टया अपराध साबित होता हो, तो आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है। लेकिन यदि अदालत को लगे कि आरोप निराधार और योग्यता-रहित हैं, तो धारा 438 के तहत अदालत विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर सकती है। पृष्ठभूमि- यह मामला महाराष्ट्र के धाराशिव ज़िले का है, जहाँ चुनाव के बाद झगड़े के दौरान एक दलित परिवार पर हमला और जातिसूचक गालियाँ देने का आरोप लगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे राजनीतिक प्रेरित मानते हुए...

₹73,000 वेतन और ₹80 लाख फ्लैट वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता:-इलाहाबाद हाईकोर्ट

रु  73,000  वेतन और रु 80 लाख फ्लैट वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता : इलाहाबाद हाईकोर्ट  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम पत्नी को पति से भरण-पोषण (Maintenance) का दावा नहीं मिल सकता। मामला क्या था? पत्नी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और ₹73,000 मासिक वेतन पाती है। उसने ₹80 लाख का फ्लैट भी खरीदा हुआ है। पारिवारिक न्यायालय ने पति को आदेश दिया था कि वह पत्नी को ₹15,000 मासिक और नाबालिग बेटे को ₹25,000 मासिक गुजारा भत्ता दे। हाईकोर्ट का फैसला- जस्टिस सौरभ लवानी ने कहा कि पत्नी की आय उसके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। इसलिए, पारिवारिक न्यायालय द्वारा पत्नी को दिए गए ₹15,000 भरण-पोषण का आदेश रद्द कर दिया गया। लेकिन नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए ₹25,000 मासिक देने का आदेश बरकरार रखा गया। कानूनी आधार- न्यायालय ने राजनीश बनाम नेहा (SC) केस का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी की आय हमेशा भरण-पोषण को रोक नहीं सकती, परंतु यदि उसकी आय वैवाहिक स्तर के अनुरूप जीवन-यापन के लिए पर्याप्त है, तो पति को गुजार...

बिना रजिस्ट्रेशन शादी वैध, तलाक भी सम्भव:- इलाहाबाद हाईकोर्ट

 बिना रजिस्ट्रेशन शादी वैध, तलाक भी संभव: इलाहाबाद हाईकोर्ट  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल शादी का रजिस्ट्रेशन न होने के कारण विवाह अवैध नहीं माना जा सकता। साथ ही, तलाक की कार्यवाही को भी इससे प्रभावित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि शादी का रजिस्ट्रेशन केवल एक दस्तावेज है, जो विवाह का प्रमाण प्रस्तुत करता है, लेकिन विवाह की वैधता का आधार नहीं है। कानून स्वयं यह मान्यता देता है कि बिना रजिस्ट्रेशन के भी वैवाहिक संबंध वैध माने जाएंगे। इस निर्णय में पारिवारिक अदालत द्वारा दी गई उस आपत्ति को खारिज कर दिया गया जिसमें बिना रजिस्ट्रेशन के तलाक की अर्जी को अस्वीकार कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा दृष्टिकोण गलत है और तलाक की प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन दंपतियों के लिए राहत लेकर आया है जिनकी शादी बिना रजिस्ट्रेशन के हुई है और जो वैधानिक प्रक्रिया में तलाक लेना चाहते हैं।

गवाही जिस भाषा में दी जाए, उसी में रिकॉर्ड हो — केवल अंग्रेज़ी की परंपरा अनुचित:-सुप्रीम कोर्ट

गवाही जिस भाषा में दी जाए, उसी में रेकॉर्ड हो - केवल अँग्रेजी की परंपरा अनुचित : सुप्रीम कोर्ट  सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को सख्त निर्देश दिए हैं कि गवाह की गवाही उसी भाषा में दर्ज की जाए, जिस भाषा में वह गवाही दे रहा है। केवल अंग्रेज़ी में रिकॉर्ड करना न्याय और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 277 स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि यदि गवाह अंग्रेज़ी के अलावा किसी अन्य भाषा में गवाही देता है, तो उसे उसी भाषा में रिकॉर्ड किया जाए। अनुवाद की स्थिति में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि गवाह के शब्दों का वास्तविक अर्थ और भाव सुरक्षित रहे। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले में आई जिसमें एक गवाह की हिंदी में दी गई गवाही को अंग्रेज़ी में दर्ज किया गया था। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से गवाह के असली बयान का अर्थ बदल सकता है और न्याय प्रभावित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन है और इससे यह सुनिश्चित होगा कि न्यायिक प्रक्रिया आम लोगों की भाषा में भी समान रूप से सुरक्षित रहे।

सरकारी नौकरी के बावजूद पत्नी को बेसहारा बताने पर हाईकोर्ट सख्त

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पत्नी खुद सरकारी नौकरी कर रही है और पर्याप्त वेतन कमा रही है, तो वह खुद को बेसहारा बताकर पति से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। ✦ मामले में पत्नी डॉक्टर के पद पर सरकारी सेवा में थी और लगभग ₹70,000 मासिक वेतन पा रही थी। ✦ इसके बावजूद उसने पारिवारिक न्यायालय में हलफनामा देकर खुद को असहाय बताया और ₹14,000 मासिक भरण-पोषण का आदेश प्राप्त कर लिया। ✦ पति ने इस आदेश को चुनौती दी। ✦ हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए पत्नी के खिलाफ झूठा हलफनामा देने पर मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए। ✦ साथ ही अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 6 हफ्तों में पूरी की जाए। यह फैसला स्पष्ट करता है कि भरण-पोषण केवल उन्हीं महिलाओं को मिल सकता है जो वास्तव में खुद असमर्थ हों।

कमाने वाली पत्नी से घर खर्च और EMI माँगना क्रूरता नहीं:-कलकत्ता हाईकोर्ट

  कमाने वाली पत्नी से घर खर्च और EMI मांगना क्रूरता नहीं : कलकत्ता हाईकोर्ट  कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि पति अपनी कमाने वाली पत्नी से घर खर्च या EMI में योगदान देने की बात करता है, तो इसे क्रूरता (Cruelty) नहीं माना जा सकता। ✦ मामला एक दंपत्ति के बीच घरेलू विवाद से जुड़ा था। ✦ पत्नी का आरोप था कि पति उससे घर के खर्च और EMI चुकाने की माँग करता है, जो उसके अनुसार मानसिक क्रूरता है। ✦ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी दोनों की आय यदि है, तो परिवार की जिम्मेदारियाँ साझा करना स्वाभाविक और न्यायसंगत है। ✦ केवल घर खर्च या EMI माँगने को आधार बनाकर मानसिक क्रूरता का आरोप साबित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा – “परिवार चलाना दोनों की समान जिम्मेदारी है। कमाने वाली पत्नी को आर्थिक योगदान से छूट नहीं दी जा सकती।”