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सुप्रीम कोर्ट सख्त हाईकोर्ट 3 महीने में फैसला न सुनाए तो मामला चीफ जस्टिस के सामने रखा जाए

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 सुप्रीम कोर्ट सख्त हाईकोर्ट 3 महीने में फैसला न सुनाए तो मामला चीफ जस्टिस के सामने रखा जाए । सुप्रीम कोर्ट सख्त हाईकोर्ट 3 महीने में फैसला न सुनाए तो मामला चीफ जस्टिस के सामने रखा जाए सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्याय व्यवस्था में तेजी लाने के लिए एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि अगर हाईकोर्ट तीन महीने के भीतर लंबित मामलों पर फैसला नहीं सुनाता है तो उस मामले को सीधे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैसलों में देरी से जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर होता है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रज्वल प्रसाद की पीठ ने कहा कि समय पर न्याय मिलना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि न्याय मिलना। अदालत ने कहा कि यदि कोई आरोपी बरी हो जाता है, तो पीड़ित और उसके परिजन भी अपील का अधिकार रखते हैं। यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले रखे गए जिनमें हाईकोर्ट ने लंबे समय से फैसला सुरक्षित रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर है। यह निर्देश न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या कम करने और पीड...

55 हजार रुपये भरण-पोषण सिक्कों में दिए, पत्नी ने कहा – यह मानसिक प्रताड़ना

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  55 हजार रुपये भरण पोषण सिक्कों में दिए, पत्नी ने कहा - यह मानसिक प्रताड़ना   55 हजार रुपये भरण-पोषण सिक्कों में दिए, पत्नी ने कहा – यह मानसिक प्रताड़ना पति-पत्नी के विवाद से जुड़ा एक अनोखा मामला पारिवारिक न्यायालय में सामने आया है। अदालत ने पति को आदेश दिया था कि वह अपनी पत्नी को भरण-पोषण के रूप में 55,000 रुपये अदा करे। लेकिन पति ने यह रकम नोटों में न देकर 280 किलो सिक्कों में इकट्ठा कर ली और सात कट्टों में भरकर अदालत में जमा करा दी। पति का कहना था कि सिक्के भी वैध मुद्रा हैं और कानूनन उन्हें लेने से इनकार नहीं किया जा सकता। उसने न्यायालय से आग्रह किया कि अदालत खुद इन सिक्कों की गिनती करवाए। दूसरी ओर पत्नी ने इस कदम को मानसिक प्रताड़ना बताया। उसका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में सिक्कों को उठाना, गिनना और उपयोग करना व्यवहारिक रूप से असंभव है। इस वजह से यह एक तरह का अपमान और परेशान करने की कोशिश है। अदालत ने सिक्कों को फिलहाल सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है और मामले पर अगली सुनवाई तय की है। गौरतलब है कि पति पर पहले से ही 1.70 लाख रुपये का बकाया भरण-पोषण भी है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई महिला किसी नाबालिग लड़के को अपने साथ यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित या नियंत्रित करती है, तो यह कृत्य भी POCSO एक्ट की धारा 3 के अंतर्गत अपराध माना जाएगा।

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  कर्नाटका हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई महिला किसी नाबालिङ्ग लड़के को अपने साथ यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित या नियंत्रित करती है, तो यह क्रत्य भी POSCO अक्त की धारा 3 के अंतर्गत अपराध माना जाएगा। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई महिला किसी नाबालिग लड़के को अपने साथ यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित या नियंत्रित करती है, तो यह कृत्य भी POCSO एक्ट की धारा 3 के अंतर्गत अपराध माना जाएगा। मामला क्या था? 52 वर्षीय महिला के खिलाफ दर्ज POCSO केस को रद्द करने की मांग की गई थी। दलील दी गई कि POCSO का उद्देश्य केवल पुरुषों द्वारा बच्चियों के शोषण को रोकना है, न कि महिलाओं द्वारा किए गए कृत्यों को। कोर्ट की टिप्पणी हाईकोर्ट ने साफ कहा कि – POCSO का उद्देश्य केवल शारीरिक भिन्नताओं को औपचारिक रूप से पहचानना नहीं है, बल्कि बच्चों को हर प्रकार के यौन शोषण से सुरक्षा देना है। यदि किसी भी रूप में नाबालिग को यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर या उकसाया जाता है, चाहे आरोपी पुरुष हो या महिला, वह POCSO के तहत दंडनीय अपराध होगा। कानूनी महत्व- यह निर्...

सिर्फ़ दो साल साथ रहे, कोर्ट में 17 साल तक लड़े – आखिरकार पति बन गया संन्यासी

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सिर्फ दो साल साथ रहे, कोर्ट में 17 साल तक लड़े- आखिरकार पति बन गया सन्यासी  पति-पत्नी का रिश्ता महज़ दो साल चला, लेकिन अदालतों में उनकी लड़ाई पूरे 17 साल तक खिंची रही। पत्नी ने पति और उसके परिवार पर अलग-अलग धाराओं में लगभग 10 केस दर्ज कराए। लंबे मुकदमों और मानसिक तनाव से थककर पति ने अंततः संन्यास ले लिया और साधु का जीवन अपना लिया। विवाद की शुरुआत- विवाह वर्ष 2005 में हुआ था, लेकिन 2007 में पत्नी घर छोड़कर चली गई। पति ने पारिवारिक न्यायालय शिवपुरी में तलाक का केस दायर किया। पत्नी ने इसका विरोध किया और पति व ससुराल वालों के खिलाफ लगातार केस दर्ज कराती रही। अदालत में लंबा संघर्ष- निचली अदालत ने 2015 में पति को तलाक की डिक्री दे दी, लेकिन पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। इस बीच कानूनी विवादों और आपसी झगड़ों से परेशान पति ने संन्यासी बनने का निर्णय लिया। हाईकोर्ट में समझौता- हाईकोर्ट की दखल के बाद दोनों पक्ष आपसी सहमति से तलाक पर राज़ी हुए। समझौते के तहत पति ने पत्नी को स्थायी भरण-पोषण के रूप में 6.15 लाख रुपये देने की शर्त मानी। कानूनी टिप्पणी- वैवाहिक विवादों का लंबा खिंचना न केवल पति-पत...

क्रूरता साबित किए बिना नहीं हो सकता तलाक:- इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  क्रूरता साबित किए बिना नहीं हो सकता तलाक: हाई कोर्ट  हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में यह स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच विवाद होने पर यदि क्रूरता का आरोप लगाया गया है, तो उसे साबित करना अनिवार्य है। बिना पर्याप्त सबूत के केवल आरोपों के आधार पर तलाक की डिक्री पारित नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक न्यायालयों को क्रूरता के आरोप की गहराई से जांच करनी होगी और तभी कोई निर्णय लिया जा सकता है। 2015 के एक मामले में पारिवारिक न्यायालय द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को हाईकोर्ट ने इसी आधार पर निरस्त कर दिया।

वादा करने के बाद प्रेमी का विवाह न करना अपराध नहीं:-हाईकोर्ट

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 वादा करने के बाद प्रेमी का विवाह न करना अपराध नहीं : हाई कोर्ट  हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई विवाहित महिला अपने प्रेमी पर विवाह का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाती है, तो यह आरोप अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। न्यायालय ने अभियुक्त को दुराचार और उत्पीड़न के आरोप से उन्मोचित करने के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि इस मामले में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी ने महिला को धोखा देने की नीयत से विवाह का वादा किया था। मामला क्या था? पीड़िता ने अभियुक्त पर आरोप लगाया कि उसने विवाह का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इंकार कर दिया। उसने अभियुक्त के खिलाफ 2023 में एफआईआर दर्ज कराई थी। अदालत के सामने आए तथ्यों के अनुसार, पीड़िता स्वयं विवाहित थी और अभियुक्त के साथ लंबे समय से संबंध में थी। पीड़िता का आरोप था कि अभियुक्त ने विवाह का वादा कर उसका शोषण किया। हाईकोर्ट का अवलोकन हाईकोर्ट ने कहा कि— विवाहित महिला के साथ विवाह का वादा अपने आप में अवैध है क्योंकि विधि सम्मत विवाह संभव ही नहीं है। अभियुक्त द्वार...

FIR बदले की भावना का नतीजा, कानून का घोर दुरुपयोग ससुराल वालों के खिलाफ 498A का केस रद्द:-पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

एफ़आईआर बदले की भावना का नतीजा, कानून का घोर दुरुप्रयोग ससुराल वालो के खिलाफ 498 ए का केस रद्ध । पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट