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Cyber Crime in India – Legal Awareness and Prevention

  Meta Description: Know about different types of cyber crimes in India, legal penalties, and how to protect yourself online. Introduction Cybercrime is on the rise with the increasing use of internet and digital devices. Indian law provides strict penalties to protect citizens against hacking, phishing, identity theft, and other cyber offenses. Types of Cyber Crimes Hacking: Unauthorized access to computer systems Phishing: Fraudulent attempts to obtain sensitive information Identity Theft: Using someone else’s identity for illegal purposes Online Fraud: Scams, fake websites, and e-commerce cheating Cyber Stalking / Harassment Legal Penalties Information Technology Act 2000 : Covers hacking, identity theft, cyber fraud, and online defamation Indian Penal Code (IPC) : Sections 66, 66A, and 66C for cyber offenses Penalties include fines, imprisonment , or both How to File a Complaint Collect all evidence (screenshots, emails, transactio...

Understanding Consumer Rights in India – A Complete Guide

  Meta Description: Detailed guide on consumer rights in India, filing complaints, and legal remedies under the Consumer Protection Act. Introduction Consumer rights protect individuals from exploitation by sellers or service providers. The Consumer Protection Act 2019 empowers Indian citizens to seek legal remedies in case of unfair trade practices, defective products, or deficient services. Key Rights of a Consumer Right to Safety: Protection from hazardous goods or services Right to Information: Access complete details about products/services Right to Choose: Freedom to select goods and services without pressure Right to Redressal: Ability to seek compensation for grievances Right to be Heard: Consumers’ voices must be considered in policymaking How to File a Consumer Complaint Identify the Forum : District, State, or National Consumer Dispute Redressal Commission (depending on claim amount) Draft a complaint including: Complainant’s detai...

How to File an FIR in India – Step by Step Guide

Meta Description: Learn how to file an FIR in India, the legal process, required documents, and your rights as a complainant. Introduction FIR (First Information Report) is the first and most important step in reporting a crime in India. Filing an FIR ensures that the police officially record your complaint and take action according to the law. Every citizen has the right to file an FIR under Section 154 of the Criminal Procedure Code (CrPC). Step 1: Identify the Correct Police Station Check jurisdiction : FIR should be filed at the police station under which the crime occurred. If unsure, visit local police station or check online portals for jurisdiction details. Step 2: Draft the FIR Include the following details: Your full name and contact details Date, time, and place of the incident Detailed description of the crime Names of involved persons, if known Witness information, if any Tip: Be precise and factual . Avoid personal opinions or assumptio...

जब कानून ढाल नहीं, हथियार बन जाए तो सबसे बड़ा अन्याय वहीं से शुरू होता है-

  जब कानून ढाल नहीं, हथियार बन जाय तो सबसे बड़ा अन्याय वही से शुरू होता है :  Meta Description: जानिए कैसे कानून की कमजोरी समाज में अन्याय और हिंसा को जन्म देती है, और कैसे कानून का सही पालन समाज को सुरक्षित बनाता है। परिचय “जब कानून ढाल नहीं, हथियार बन जाय तो सबसे बड़ा अन्याय वही से शुरू होता है।” यह कथन समाज और कानून के बीच के असंतुलन को दर्शाता है। कानून केवल नियम नहीं है, बल्कि समाज में न्याय और सुरक्षा की गारंटी है। जब कानून मजबूत नहीं होता या उसका पालन नहीं किया जाता, तो लोग अपना अधिकार हथियार या हिंसा के माध्यम से हासिल करने की कोशिश करते हैं। कानून की कमजोरी और समाज पर प्रभाव अपराध बढ़ना: जब लोग जानते हैं कि कानून कमजोर है, तो अपराध करने में डर नहीं लगता। अन्याय का प्रसार: कमजोर कानून की वजह से गरीब और कमजोर वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। हथियार और हिंसा का सहारा: कानूनी सुरक्षा न होने पर लोग व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए हथियार का सहारा लेते हैं। उदाहरण: अगर किसी क्षेत्र में पुलिस या न्यायिक प्रणाली ठीक से काम नहीं करती, तो अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और...

पति-पत्नी में से किसी के दोबारा विवाह करने के बाद तलाक को चुनौती नहीं दी जा सकती:-मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

 पति - पत्नी में से किसी के दोवारा विवाह करने के बाद तलाक को चुनौती नहीं दी जा सकती : मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय  Meta Description: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का फैसला – किसी भी पक्ष द्वारा विवाह करने के बाद तलाक को चुनौती देना संभव नहीं। जानिए कानून क्या कहता है। परिचय हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें कहा गया कि पति या पत्नी में से कोई भी पक्ष, विवाह के बाद तलाक को चुनौती नहीं दे सकता । यह फैसला विवाह और तलाक के कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करता है और समाज में विवाह संबंधों की स्थिरता को बढ़ावा देता है। केस का संक्षिप्त विवरण स्थान: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय मुद्दा: तलाक के बाद चुनौती निर्णय: यदि पति या पत्नी ने पुनः विवाह कर लिया है, तो तलाक को चुनौती देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचता। मुख्य बिंदु: विवाह के बाद तलाक पर challenge करने का अधिकार समाप्त हो जाता है। पुनर्विवाह करने वाला पक्ष यह साबित नहीं कर सकता कि पहले का तलाक अवैध था। कोर्ट का उद्देश्य है कि नए विवाहों और परिवार की स्थिरता को सुरक्षित रखना। कानूनी महत्व यह ...

क्या ससुर की प्रॉपर्टी में दामाद को हिस्सा मिलता है? जानिए भारतीय कानून क्या कहता है

 क्या ससुर की प्रॉपर्टि में दामाद को हिस्सा मिलता है ? जानिए भारतीय कानून क्या कहता है ।  भारत में अक्सर प्रॉपर्टी विवाद सामने आते रहते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि दामाद ससुर की संपत्ति में अधिकार की मांग करता है। सवाल यह है कि क्या दामाद को ससुर की संपत्ति में कानूनी अधिकार मिलता है? इस पर भारतीय कानून क्या कहता है, आइए जानते हैं। भारतीय कानून की स्थिति- भारतीय उत्तराधिकार कानून के अनुसार, दामाद का अपने ससुर की संपत्ति में कोई स्वतः अधिकार नहीं होता। चाहे व्यक्ति हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या ईसाई किसी भी धर्म में दामाद को सीधे तौर पर ससुर की संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया गया है। संपत्ति का बंटवारा केवल कानूनी वारिसों में होता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (Hindu Succession Act) इस कानून में संपत्ति के क्लास 1 और क्लास 2 वारिसों की सूची दी गई है। क्लास 1 में पत्नी, बेटा, बेटी, मां आदि आते हैं। क्लास 2 में भाई, बहन, चाचा आदि दूर के रिश्तेदार आते हैं। इस लिस्ट में दामाद का नाम शामिल नहीं है। इसलिए दामाद को ससुर की पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलता। कब दामाद को मिल...

फर्जी SC-ST एक्ट केस दर्ज कराने वाली महिला को डेढ़ साल की सजा

 फर्जी SC- ST एक्ट केस दर्ज कराने वाली महिला को डेढ़ साल की सजा  चुनावी रंजिश में ग्राम प्रधान पर झूठा SC-ST एक्ट का मुकदमा दर्ज कराने वाली महिला को अदालत ने डेढ़ साल कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने साफ कहा कि यह कानून दलित और आदिवासी समाज की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। फर्जी रिपोर्ट दर्ज कराना न केवल निर्दोषों को परेशान करता है बल्कि असली पीड़ितों के लिए न्याय पाना भी कठिन बना देता है। अदालत ने आदेश दिया कि अगर महिला को कोई राहत राशि दी गई है तो उसे वापस लिया जाए। कोर्ट ने यह भी चेताया कि करदाताओं का पैसा झूठे मुकदमों पर बर्बाद नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह चिंता जताई कि पंचायती चुनावों में दुश्मनी के कारण समाज में वैमनस्य बढ़ रहा है और निर्दोष लोगों को बेवजह फंसाया जा रहा है।

चार्जशीट क्या होती है और इसका महत्व:-

चार्जशीट क्या होती है और इसका महत्व:  Meta Description: जानिए चार्जशीट क्या होती है, इसे कौन दाखिल करता है, प्रक्रिया क्या है और इसका भारतीय कानून में महत्व। परिचय भारतीय न्याय व्यवस्था में चार्जशीट (Chargesheet) एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यह आरोपी के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज आरोपों का औपचारिक विवरण है और अदालत में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया की शुरुआत करती है। कानून का उद्देश्य है कि न्याय तंत्र निष्पक्ष और पारदर्शी हो , और चार्जशीट इसी दिशा में पहला कदम है। चार्जशीट की परिभाषा चार्जशीट वह आधिकारिक दस्तावेज़ है जिसे पुलिस या प्रॉसिक्यूटर (Public Prosecutor) अदालत में दाखिल करता है। इसमें शामिल होते हैं: आरोपी का नाम और विवरण अपराध का प्रकार और तिथि गवाहों के बयान साक्ष्य का विवरण कानूनी धाराएँ जिनके तहत आरोप लगाया गया है चार्जशीट यह साबित करती है कि पुलिस ने मामले की जांच पूरी कर ली है और अदालत में मुकदमा चलाने योग्य सबूत जुटा लिए हैं। भारतीय कानून में चार्जशीट भारतीय कानून में चार्जशीट के मुख्य पहलू: CrPC (Criminal Procedure Code) Section 173 पुलिस को मामला दर्ज करने के बा...

पंजाब में बहू द्वारा सास की पिटाई का वीडियो वायरल, समाज में आक्रोश

 पंजाब में बहू दुवारा सास की पिटाई का वीडियो वायरल, समाज में आक्रोस  पंजाब के गुरदासपुर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहां एक बहू ने अपनी बुजुर्ग सास की बाल पकड़कर बेरहमी से पिटाई की। यह पूरी घटना उसी घर में पोते ने मोबाइल पर रिकॉर्ड की और सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वीडियो में साफ दिखता है कि बुजुर्ग महिला दर्द से चिल्लाती रही, रोती रही, लेकिन बहू लगातार गालियां देते हुए उन्हें मारती रही। पोता अपनी मां से बार-बार कहता रहा – “मम्मा छोड़ दो”, मगर इसके बावजूद पिटाई जारी रही। घटना पर महिला आयोग ने स्वत: संज्ञान लिया है और गुरदासपुर पुलिस से रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि बुजुर्गों पर हिंसा किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह मामला सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आईना है। जहां बुजुर्गों को सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए, वहीं हिंसा और अपमान की खबरें हमारे सामाजिक ताने-बाने को तोड़ती हैं।

रिश्तों में दावों की जंग महिला बोली मैं कानूनी पत्नी, बेटे ने कहा नौकरानी हो

 रिश्तों में दावों की जंग महिला बोली में कानूनी पत्नी, बेटे ने कहा नौकरानी हो ।  परिवार के अंदर उठे विवाद ने एक बार फिर रिश्तों की कड़वाहट को सामने ला दिया। मामला तब बिगड़ा जब महिला ने खुद को कानूनी पत्नी बताते हुए संपत्ति और सम्मान पर दावा किया। वहीं, सौतेले बेटे ने उसका दावा मानने से इनकार करते हुए तंज कस दिया “तुम पत्नी नहीं, नौकरानी हो” अदालत अब दस्तावेज़ों और साक्ष्यों के आधार पर तय करेगी कि महिला का दावा सही है या नहीं। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि रिश्तों की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और जब वही डगमगाने लगती है, तो परिवार अदालत की चौखट तक पहुँच जाता है।

तलाकशुदा पत्नी भरण-पोषण की हकदार, चाहे तलाक का आधार या तरीका कुछ भी हो:-दिल्ली हाईकोर्ट

तालकशुदा पत्नी भरण - पोषण की हकदार, चाहे तलाक का आधार या तरीका कुछ भी हो : दिल्ली हाईकोर्ट  तलाकशुदा पत्नी भरण-पोषण की हकदार, चाहे तलाक का आधार या तरीका कुछ भी हो:-दिल्ली हाईकोर्ट केस शीर्षक-Umar Haris v. Yusra Meraj & Anr., Crl. Rev. P. 345/2024 दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा पत्नी भरण-पोषण पाने की हकदार होती है, चाहे तलाक का आधार या तरीका कुछ भी क्यों न हो। अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 का उद्देश्य पत्नी और बच्चों को भूखों मरने से बचाना है और इसका लाभ किसी भी तलाकशुदा पत्नी को उपलब्ध है। मामला- याचिकाकर्ता पति ने फैमिली कोर्ट में लंबित पत्नी की भरण-पोषण याचिका को चुनौती दी थी। दोनों पक्षों का विवाह वर्ष 2018 में इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ और 2019 में एक पुत्र का जन्म हुआ। वैवाहिक विवादों के चलते वर्ष 2021 में तलाक-ए-खुला के माध्यम से विवाह विच्छेद हुआ। तलाक के समय पत्नी व पुत्र को 33 लाख रुपये “पूर्ण और अंतिम निपटान” (full and final settlement) के रूप में दिए गए। इसके बावजूद, पत्नी ने वर्ष 2023 में अपने और नाबालिग पुत्र के लिए ₹1,20,000 मासिक भरण-पोष...

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक एडल्टरी (व्यभिचार) मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक एडल्टरी (व्यभिचार) मामले में बड़ा फैसला सुनाया है ।  दिल्ली हाई कोर्ट ने एक एडल्टरी (व्यभिचार) मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी पति को बरी करते हुए कहा कि "पत्नी को पति की संपत्ति मानने की सोच अब असंवैधानिक है"। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पारंपरिक सोच जिसमें पत्नी को पति की सारी संपत्ति और अधिकार मान लिया जाता था, संपूर्ण भारतीय संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने यह उदाहरण देते हुए कहा कि "द्रौपदी की कोई आवाज़ नहीं थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया"। इस फैसले से यह साफ़ हो गया कि पति या पत्नी के खिलाफ गलत विचार या संपत्ति पर नियंत्रण की धारणा अब कानून द्वारा समर्थित नहीं है। अदालत ने कहा कि विवाह केवल पारस्परिक सम्मान, विश्वास और साझेदारी का संबंध है, और किसी भी पक्ष का व्यक्तिगत अधिकार संविधान के तहत सुरक्षित है। मुख्य बिंदु- 1-पति की संपत्ति को पत्नी का अधिकार मानना असंवैधानिक है। 2-व्यभिचार (Adultery) के मामलों में आरोपी को बिना पर्याप्त साक्ष्य के दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 3-अदालत ने पारंपरिक और ...

मध्य प्रदेश कोर्ट का फैसला- पति-पत्नी की अश्लील चैट और बातचीत तलाक का आधार बन सकती है

  मध्य-प्रदेश कोर्ट का फैसला - पति - पत्नी की अश्लील चैट और बातचीत तलाक का आधार बन सकती है ।  मध्य प्रदेश की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर पति या पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ अश्लील चैट, संदेश या बातचीत करते हैं, तो इसे वैवाहिक क्रूरता और विश्वासघात माना जा सकता है। ऐसे मामलों में दूसरा पक्ष अदालत में तलाक के लिए याचिका दाखिल कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच विश्वास और सम्मान का संबंध है। यदि कोई पक्ष इस भरोसे को तोड़ता है और अश्लील बातचीत करता है, तो यह न केवल मानसिक पीड़ा देता है बल्कि विवाह की नींव को भी कमजोर करता है। इस फैसले से यह साफ हो गया कि डिजिटल माध्यम पर की गई अश्लील बातचीत को भी वैवाहिक विवाद में गंभीर रूप से लिया जाएगा और इसका असर तलाक की प्रक्रिया में पड़ सकता है। मुख्य बिंदु- 1-अश्लील चैट, मैसेज या बातचीत वैवाहिक क्रूरता और विश्वासघात के अंतर्गत आती है। 2-दूसरे पक्ष को इसका सामना करते हुए तलाक के लिए याचिका दायर करने का अधिकार है। 3-कोर्ट ने डिजिटल माध्यमों पर किए गए व्यवहार को भी वैवाहिक कानून में मान्यता ...

कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला-पत्नी के दोस्तों और परिवार के लगातार घर पर रहने को क्रूरता माना, पति को तलाक की मंजूरी:-

कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला पत्नी के दोस्तो और परिवार के लगातार घर पर रहने को क्रूरता माना, पति को तलाक की मंजूरी:  कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण तलाक मामले में फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि पत्नी के दोस्त और परिवार का सदस्य लगातार पति की मर्जी के बिना घर में रहते हैं और पति इससे असहज महसूस करता है, तो इसे वैवाहिक क्रूरता माना जा सकता है। मामले में पति ने याचिका दायर की थी क्योंकि उसकी पत्नी ज्यादातर समय अपनी मित्र के साथ ही बिताती थी और उसका मित्र हर वक्त घर में रहता था। इस वजह से पति मानसिक और भावनात्मक रूप से असहज महसूस कर रहा था। निचली अदालत ने पहले तलाक देने से इनकार किया था, लेकिन याचिकाकर्ता ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी। कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति के तर्क को सही मानते हुए तलाक की मंजूरी दे दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी का यह रवैया पति के लिए क्रूरता के समान है और विवाह में दोनों पक्षों की मानसिक शांति और सम्मान बनाए रखना जरूरी है। मुख्य बातें- 1-पत्नी के दोस्त और परिवार का पति की मर्जी के बिना घर में लगातार रहना क्रूरता के बराबर माना गया। 2-तलाक की मंजूरी इस...

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है ।   मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि एक मुस्लिम महिला अपने द्विविवाही पति से मुआवजा पाने की हकदार है, यदि पति ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी की हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति का यह कृत्य महिला के लिए मानसिक क्षति का कारण बनता है और यह महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत 'घरेलू हिंसा' की परिभाषा में आता है। कानूनी सीख- 1. बिना तलाक दिए दूसरी शादी करना महिला के अधिकारों का उल्लंघन है। 2. मानसिक और भावनात्मक क्षति का मुआवजा अदालत के माध्यम से लिया जा सकता है। 3. यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के संरक्षण और उनके अधिकारों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण उदाहरण है।

Supreme Court ने 4 साल पुरानी रेप केस को किया खारिज, अस्पष्ट आरोपों को माना आधारहीन

  सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल पुराने रेप केस को किया खारिज, असपष्ट आरोपों को माना आधारहीन  Supreme Court ने हाल ही में एक रेप मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें अल्जेड आरोपों और चार साल के देरी से केस दर्ज होने को देखते हुए मुकदमा खारिज कर दिया गया। मामले की पृष्ठभूमि- मामला चार साल पहले दर्ज किया गया था, लेकिन जांच और आरोपों में स्पष्टता नहीं थी। आरोपियों ने तर्क दिया कि देर से शिकायत और अस्पष्टता के कारण मुकदमा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। कोर्ट के तर्क- 1. Delay in filing complaint: कोर्ट ने कहा कि 4 साल की देरी मामले की credibility को प्रभावित करती है। 2. Vague allegations- अस्पष्ट और contradictory बयान साक्ष्य की कमी दर्शाते हैं। 3. Fair trial का अधिकार-आरोपी पक्ष के न्यायपूर्ण सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने मुकदमे को खारिज किया। फैसला- Supreme Court ने मुकदमा खारिज कर दिया। यह फैसला अस्पष्ट और पुरानी शिकायतों पर मुकदमा चलाने में सावधानी बरतने की दिशा को स्पष्ट करता है।

एससी/एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत तभी जब प्रथम दृष्टया मामला साबित न हो:-सुप्रीम कोर्ट

 एससी/एसटी ऐक्ट में अग्रिम जमानत तभी जब प्रथम द्रश्यता मामला साबित न हो: सुप्रीमकोर्ट  सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर रोक है। लेकिन यह रोक पूर्ण नहीं है, बल्कि तभी लागू होगी जब प्रथम दृष्टया यह साबित हो जाए कि आरोपी ने अधिनियम की धारा 3 के तहत अपराध किया है। क्या कहा अदालत ने? मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा धारा 18 स्पष्ट रूप से सीआरपीसी की धारा 438 (अग्रिम जमानत) की प्रयोज्यता को बाहर करती है। यदि आरोप विशिष्ट हों और प्रथम दृष्टया अपराध साबित होता हो, तो आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है। लेकिन यदि अदालत को लगे कि आरोप निराधार और योग्यता-रहित हैं, तो धारा 438 के तहत अदालत विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर सकती है। पृष्ठभूमि- यह मामला महाराष्ट्र के धाराशिव ज़िले का है, जहाँ चुनाव के बाद झगड़े के दौरान एक दलित परिवार पर हमला और जातिसूचक गालियाँ देने का आरोप लगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे राजनीतिक प्रेरित मानते हुए...

₹73,000 वेतन और ₹80 लाख फ्लैट वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता:-इलाहाबाद हाईकोर्ट

रु  73,000  वेतन और रु 80 लाख फ्लैट वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता : इलाहाबाद हाईकोर्ट  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम पत्नी को पति से भरण-पोषण (Maintenance) का दावा नहीं मिल सकता। मामला क्या था? पत्नी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और ₹73,000 मासिक वेतन पाती है। उसने ₹80 लाख का फ्लैट भी खरीदा हुआ है। पारिवारिक न्यायालय ने पति को आदेश दिया था कि वह पत्नी को ₹15,000 मासिक और नाबालिग बेटे को ₹25,000 मासिक गुजारा भत्ता दे। हाईकोर्ट का फैसला- जस्टिस सौरभ लवानी ने कहा कि पत्नी की आय उसके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। इसलिए, पारिवारिक न्यायालय द्वारा पत्नी को दिए गए ₹15,000 भरण-पोषण का आदेश रद्द कर दिया गया। लेकिन नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए ₹25,000 मासिक देने का आदेश बरकरार रखा गया। कानूनी आधार- न्यायालय ने राजनीश बनाम नेहा (SC) केस का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी की आय हमेशा भरण-पोषण को रोक नहीं सकती, परंतु यदि उसकी आय वैवाहिक स्तर के अनुरूप जीवन-यापन के लिए पर्याप्त है, तो पति को गुजार...

बिना रजिस्ट्रेशन शादी वैध, तलाक भी सम्भव:- इलाहाबाद हाईकोर्ट

 बिना रजिस्ट्रेशन शादी वैध, तलाक भी संभव: इलाहाबाद हाईकोर्ट  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल शादी का रजिस्ट्रेशन न होने के कारण विवाह अवैध नहीं माना जा सकता। साथ ही, तलाक की कार्यवाही को भी इससे प्रभावित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि शादी का रजिस्ट्रेशन केवल एक दस्तावेज है, जो विवाह का प्रमाण प्रस्तुत करता है, लेकिन विवाह की वैधता का आधार नहीं है। कानून स्वयं यह मान्यता देता है कि बिना रजिस्ट्रेशन के भी वैवाहिक संबंध वैध माने जाएंगे। इस निर्णय में पारिवारिक अदालत द्वारा दी गई उस आपत्ति को खारिज कर दिया गया जिसमें बिना रजिस्ट्रेशन के तलाक की अर्जी को अस्वीकार कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा दृष्टिकोण गलत है और तलाक की प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन दंपतियों के लिए राहत लेकर आया है जिनकी शादी बिना रजिस्ट्रेशन के हुई है और जो वैधानिक प्रक्रिया में तलाक लेना चाहते हैं।

गवाही जिस भाषा में दी जाए, उसी में रिकॉर्ड हो — केवल अंग्रेज़ी की परंपरा अनुचित:-सुप्रीम कोर्ट

गवाही जिस भाषा में दी जाए, उसी में रेकॉर्ड हो - केवल अँग्रेजी की परंपरा अनुचित : सुप्रीम कोर्ट  सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को सख्त निर्देश दिए हैं कि गवाह की गवाही उसी भाषा में दर्ज की जाए, जिस भाषा में वह गवाही दे रहा है। केवल अंग्रेज़ी में रिकॉर्ड करना न्याय और पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 277 स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि यदि गवाह अंग्रेज़ी के अलावा किसी अन्य भाषा में गवाही देता है, तो उसे उसी भाषा में रिकॉर्ड किया जाए। अनुवाद की स्थिति में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि गवाह के शब्दों का वास्तविक अर्थ और भाव सुरक्षित रहे। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले में आई जिसमें एक गवाह की हिंदी में दी गई गवाही को अंग्रेज़ी में दर्ज किया गया था। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से गवाह के असली बयान का अर्थ बदल सकता है और न्याय प्रभावित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन है और इससे यह सुनिश्चित होगा कि न्यायिक प्रक्रिया आम लोगों की भाषा में भी समान रूप से सुरक्षित रहे।